अभिलेख

पत्थर और धातु पर खुदे शब्द — राजाओं, दानदाताओं और विद्वानों के छोड़े अभिलेख जिन्हें इतिहासकार आज भी पढ़ते हैं।

  1. लगभग 272/268–231 ई.पू.🏺 प्राचीन

    अशोक के अभिलेख: चार भाषाएँ

    अशोक के अधिकांश प्राकृत अभिलेख ब्राह्मी लिपि में थे; पश्चिमोत्तर में कुछ खरोष्ठी में, और अफ़ग़ानिस्तान में अरामाइक और यूनानी का प्रयोग हुआ।

  2. मौर्य काल🏺 प्राचीन

    “देवानंपिय”

    कुछ अभिलेखों में अशोक का नाम नहीं है: उनमें उसकी उपाधियाँ देवानंपिय, ‘देवताओं का प्रिय’, और पियदस्सी, ‘देखने में सुंदर’, मिलती हैं।

  3. लगभग दूसरी सदी ई.🏺 प्राचीन

    सुदर्शन झील का अभिलेख

    एक संस्कृत शिलालेख बताता है कि आँधी से तटबंध टूटने पर शक शासक रुद्रदामन ने मौर्यकालीन झील की मरम्मत करवाई — प्रजा पर कर लगाए बिना। उसी शिला पर बाद का एक गुप्त अभिलेख फिर से मरम्मत का उल्लेख करता है।

  4. आरंभिक सदियाँ🏺 प्राचीन

    साँची में दानदाताओं के नाम

    स्तूपों की रेलिंग और स्तंभों पर खुदे अभिलेख दान दर्ज करते हैं — सातवाहन जैसे राजाओं से, साँची के एक तोरण का हिस्सा बनवाने वाले हाथीदाँत कारीगरों जैसी श्रेणियों से, और सैकड़ों स्त्री-पुरुषों से।

  5. लगभग चौथी सदी ई.🏺 प्राचीन

    प्रयाग प्रशस्ति

    इसे इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख भी कहते हैं; इसे समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने संस्कृत में रचा — राजा की प्रशंसा में लिखी एक प्रशस्ति।

  6. 1836 से🏭 आधुनिक

    हम्पी के अभिलेखों का संग्रह

    1836 में ही अभिलेखशास्त्रियों ने हम्पी के मंदिरों से दर्जनों अभिलेख एकत्र करने शुरू किए, जिनसे विजयनगर साम्राज्य की पुनर्खोज में मदद मिली।

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