कला और स्थापत्य शैलियाँ
शैलचित्र, मौर्य पॉलिश, गांधार और मथुरा, मंदिर-शैलियाँ, कांस्य प्रतिमाएँ और इंडो-इस्लामी स्थापत्य।
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प्रागैतिहासिक🏺 प्राचीन
भीमबेटका के चित्रित शैलाश्रय
भोपाल के पास लगभग 800 शैलाश्रय, जिनमें से 500 पर चित्र हैं — 1957–58 में पुरातत्वविद् वी. एस. वाकणकर ने खोजे।
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लगभग 2500 ई.पू.🏺 प्राचीन
‘नर्तकी’ और लुप्त-मोम ढलाई
लुप्त-मोम ढलाई की विधि सिंधु घाटी में ज्ञात थी; मोहनजोदड़ो की ‘नर्तकी’ शायद सबसे पुरानी कांस्य प्रतिमा है।
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मौर्य काल🏺 प्राचीन
सारनाथ का सिंह-शीर्ष
मौर्य मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण — और भारत का राष्ट्रीय प्रतीक। मौर्य प्रतिमाएँ अपनी चमकदार पॉलिश के लिए भी जानी जाती हैं, जैसे दीदारगंज की यक्षी।
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पहली सदी ई.पू. – पाँचवीं सदी ई.🏺 प्राचीन
अजंता के चित्र
अजंता पहली सदी ई.पू. से पाँचवीं सदी ई. तक की चित्रकला का एकमात्र बचा हुआ उदाहरण है।
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पहली सदी ई. से🏺 प्राचीन
गांधार और मथुरा
गांधार, मथुरा और वेंगी कला के प्रमुख केंद्र बने, और पहले प्रतीकों से दिखाए जाने वाले बुद्ध को मथुरा और गांधार में मानव रूप मिला।
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मंदिर-युग🏰 मध्यकालीन
नागर, द्रविड़ — और वेसर
मंदिर दो प्रमुख शैलियों में बने: उत्तर में नागर और दक्षिण में द्रविड़; कुछ विद्वान दोनों के मेल से बनी वेसर शैली का भी उल्लेख करते हैं।
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लगभग 750 ई. के बाद🏰 मध्यकालीन
कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा
लगभग 750 ई. तक दक्कन पर अधिकार करने वाले राष्ट्रकूटों की स्थापत्य की सबसे बड़ी उपलब्धि।
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इंडो-इस्लामी काल🏰 मध्यकालीन
मेहराब और गुंबद
मेहराबी निर्माण-पद्धति आई, जिसमें आपस में जुड़े पत्थरों (वूस्वार) के मेहराब गुंबदों का भार उठा सकते थे; दीवारें पच्चीकारी, मोज़ेक, सुलेख और जालियों से सजाई गईं।
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